छत्तीसगढ़ में DGP चयन पर रार: वरिष्ठता की अनदेखी और ‘बाहरी’ दखल के आरोपों से प्रशासनिक हलकों में हड़कंप

Chattisgarh News Surajpur

रायपुर | विशेष संवाददाता

छत्तीसगढ़ का पुलिस महकमा इन दिनों एक बड़े प्रशासनिक और राजनीतिक विवाद के केंद्र में है। राज्य के नए पुलिस महानिदेशक (DGP) की नियुक्ति को लेकर चल रही प्रक्रिया ने अब एक नया मोड़ ले लिया है। वरिष्ठता क्रम में कथित छेड़छाड़, UPSC पैनल में फेरबदल और पूर्व नौकरशाहों के ‘परोक्ष हस्तक्षेप’ के आरोपों ने इस संवेदनशील चयन प्रक्रिया को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है।

वरिष्ठता दरकिनार, पैनल पर उठे सवाल

विवाद की मुख्य जड़ संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) को भेजे गए नामों का पैनल है। सूत्रों के अनुसार, राज्य सरकार ने शुरुआत में पवन देव, अरुण देव गौतम, जीपी सिंह और हिमांशु गुप्ता के नाम भेजे थे। हालांकि, जानकारों का कहना है कि वरिष्ठता के आधार पर एस.आर.पी. कल्लूरी (SRP Kalluri) का नाम इस सूची में होना अनिवार्य था, लेकिन उनकी जगह अपेक्षाकृत जूनियर और मूलतः त्रिपुरा कैडर के अधिकारी हिमांशु गुप्ता को शामिल किए जाने से पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं।

पूर्व मुख्य सचिव की भूमिका पर सियासी गर्माहट

इस पूरे मामले में पूर्व मुख्य सचिव अमिताभ जैन का नाम चर्चाओं में है। उन पर आरोप लग रहे हैं कि उन्होंने चयन प्रक्रिया को प्रभावित किया, जिसके चलते कथित तौर पर पवन देव और जीपी सिंह के नाम सूची से बाहर हो गए। गौरतलब है कि अमिताभ जैन का कार्यकाल काफी लंबा रहा और उनके समय में हुए विभिन्न घोटालों (शराब, कोल, महादेव ऐप) के बावजूद उन्हें सेवानिवृत्ति के बाद राज्य सूचना आयुक्त जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई, जो विपक्ष और आलोचकों के निशाने पर है।

प्रशासनिक विरोधाभास: बरी होने के बाद भी जीपी सिंह ‘वेटिंग’ में

राज्य पुलिस के भीतर एक और चर्चा का विषय IPS जीपी सिंह की स्थिति है। कोर्ट से क्लीन चिट मिलने और डीजी पद पर पदोन्नत होने के बावजूद, वे पिछले एक साल से बिना किसी पोस्टिंग के हैं। वहीं दूसरी ओर, अरुण देव गौतम के पास कई विभागों का अतिरिक्त प्रभार है और वे प्रभारी डीजीपी के रूप में कार्य कर रहे हैं।

प्रशासनिक जानकारों का कहना है कि गृह विभाग द्वारा अब तीन नए नाम—एस.आर.पी. कल्लूरी, विवेकानंद सिन्हा और प्रदीप गुप्ता—का पैनल भेजना इस उलझन को और बढ़ा रहा है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या सरकार डीजी स्तर के पदों का विस्तार कर रही है या यह महज एक प्रशासनिक असंतुलन है?

‘तेजतर्रार’ नेतृत्व से परहेज या चुनावी रणनीति?*

चर्चा यह भी है कि सत्ता के गलियारों में किसी ‘सख्त’ या ‘तेजतर्रार’ अधिकारी को डीजीपी बनाने को लेकर हिचकिचाहट है। कानून-व्यवस्था के आगामी चुनावों में बड़ा मुद्दा बनने की संभावना को देखते हुए नियुक्ति प्रक्रिया को लंबा खींचने की रणनीति पर भी सवाल उठ रहे हैं।

मुख्य सवाल जिनका उत्तर मिलना बाकी है: *

क्या UPSC को भेजा गया पैनल नियमों और वरिष्ठता की कसौटी पर खरा था?

  • पैनल में बार-बार बदलाव और वरिष्ठ अधिकारियों की अनदेखी का आधार क्या है?
  • क्या प्रशासनिक नियुक्तियों में अभी भी पुराने रसूखदारों का दखल बरकरार है?

फिलहाल, पूरा मामला “नियम बनाम प्रभाव” की जंग में तब्दील हो चुका है। अब सबकी नजरें इस पर टिकी हैं कि क्या सरकार वरिष्ठता को सम्मान देगी या ‘पसंदीदा’ चेहरे को कमान सौंपने का सिलसिला जारी रहेगा।


What do you feel about this post?

0%
like

Like

0%
love

Love

0%
happy

Happy

0%
haha

Haha

0%
sad

Sad

0%
angry

Angry

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *